Monday, April 30, 2007

देखना एक दिन … …

देखना एक दिन, तुम्हारे दिन लद जायेंगे
और आक्रोश भरे पँजे, तुम्हारे चेहरे से
सारे मुखौटे उतार फेकेंगे
और तुम्हारा असली चेहरा
सबके सामने आ जाएगा

फिर ना तुम होगे. ना तुम्हारे वादे
इतना खा गए, इतना खा गए कि
भैंसों के लिए चारा भी ना छोड़ा
और अब पूछते हो छप्पन भोग कैसे लगे
अरे तुम्हारे फेके हुए जूठे पत्तल ही मिल जाते
तो हम वैसे ही तर जाते

कहते है बदलता है जमाना अक्सर
यहाँ अक्सर के इन्तजार मे
हम बद से बदतर हो गये
यहाँ कौंवों ने किया सदा उत्पात
और कोयल बेचारी सूली चढ़ी

हम अक्सर दूसरों को दोष देते हैं
कभी अपने बारे में नहीं सोचते

चलचित्र पर समाचार आते ही
समूचा भारत उस समाचार वाचक
आदर्श भारतीय ललना को देख
लहालोट हो जाता है और सुर में गाता है
मिले दिल मेरा तुम्हारा तो संगम बने हमारा

उधर एक पार्टी के नेता जी
दूसरी पार्टी को न्योता देते हैं
मिले दल मेरा तुम्हारा तो दलदल बने न्यारा
जिस देश के नेता ऐसे और जनता रंगीली हो
उस देश का यारों क्या कहना

1 comment:

सुमित प्रताप सिंह said...

सादर ब्लॉगस्ते!

कृपया निमंत्रण स्वीकारें व अपुन के ब्लॉग सुमित के तडके (गद्य) पर पधारें। "एक पत्र आतंकवादियों के नाम" आपकी अमूल्य टिप्पणी हेतु प्रतीक्षारत है।