Thursday, April 12, 2007

मेरी बरखा ……

शायद ही मेरे मन से “ वो ” विस्म्रित हो…
हाँ, मैं अपनी “ बरखा ” की बात कर रहा हू

दिल्ली में बारिश ने बरसों पुराना आंकड़ा बदला था
उसी दिन की ही तो बात है, जब वो मिली थी
जी हाँ… मेरी "बरखा"

बारिश से बचने के लिए
मैने अपनी मोटरसाईकिल रोकी
और उस विशाल पेड़ की ओट मे चला गया

अनायास ही मेरी नजर उस पर पड़ी
एक पल के लिये तो मैं स्तब्ध रह गया
किन्तु जब मेरी नजर उसके चेहरे पर पड़ी
तो मैं जैसे ठगा सा महसूस कर रहा था
मेरी नजर उसके चेहरे से हटाए नहीं हट रही थी

बारिश थमने का नाम ही नही ले रही थी
जैसे ही मैं कुछ आगे बढ़ने की कोशिश की
उसके गीले बदन को ढकना चाहा
वो पीछे हो गई, जैसे वो इनकार कर रही हो
जाने क्यों फ़िर मैं भी रुक गया,
बारिश के थमने के इन्तजार में
अनायाश उस से दूर होने की आशंका

बारिश रुकी…
वहाँ से निकलने से पहले
एक बार फिर मैने उसकी तरफ देखा
उसकी आखों में जैसे कुछ अहसास थे
मै उसकी तरफ धीरे से बढा
उसके सिर पर हाथ फेर के मैं चल दिया

जैसे ही मैं वहां से चला
उसको अपने पीछे आते देखा
मेरे बुलाने पर वो मेरे साथ हो चली
ढेर सारी खुशियों के साथ मैं घर आया

घर आते ही माँ ने पूछा
ये कौन है, ये कहाँ मिली
मैने माँ को समझाया
और उसके लिये गर्म दूध मंगाया

उसकी वो भूरी भूरी आँखें
मुझे आज भी याद हैं
जब वो दूध पीते समय मुझे देख रही थी
मैने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा
और बस कुछ पल, बस कुछ पल
वो मेरे साथ वही बैठी रही
फिर ना जाने कहाँ चली गई
और तभी मैने उसका नाम “बरखा” रखा
क्योंकि मुझे वो बरिश में ही मिली थी

किन्तु, वो मेरी कहाँ…
वो तो किसी और की थी
मैं आज भी उसे याद करता हूँ
मेरी “बरखा”…… मेरी म्याऊँ……

1 comment:

Sanjeet Tripathi said...

हा हा, बढ़िया रचना।
तो अमित भाई आखिरकार आप नारद मुनि का आशिर्वाद पाने में सफल हो ही गए