Monday, April 30, 2007

देखना एक दिन … …

देखना एक दिन, तुम्हारे दिन लद जायेंगे
और आक्रोश भरे पँजे, तुम्हारे चेहरे से
सारे मुखौटे उतार फेकेंगे
और तुम्हारा असली चेहरा
सबके सामने आ जाएगा

फिर ना तुम होगे. ना तुम्हारे वादे
इतना खा गए, इतना खा गए कि
भैंसों के लिए चारा भी ना छोड़ा
और अब पूछते हो छप्पन भोग कैसे लगे
अरे तुम्हारे फेके हुए जूठे पत्तल ही मिल जाते
तो हम वैसे ही तर जाते

कहते है बदलता है जमाना अक्सर
यहाँ अक्सर के इन्तजार मे
हम बद से बदतर हो गये
यहाँ कौंवों ने किया सदा उत्पात
और कोयल बेचारी सूली चढ़ी

हम अक्सर दूसरों को दोष देते हैं
कभी अपने बारे में नहीं सोचते

चलचित्र पर समाचार आते ही
समूचा भारत उस समाचार वाचक
आदर्श भारतीय ललना को देख
लहालोट हो जाता है और सुर में गाता है
मिले दिल मेरा तुम्हारा तो संगम बने हमारा

उधर एक पार्टी के नेता जी
दूसरी पार्टी को न्योता देते हैं
मिले दल मेरा तुम्हारा तो दलदल बने न्यारा
जिस देश के नेता ऐसे और जनता रंगीली हो
उस देश का यारों क्या कहना

Thursday, April 12, 2007

मेरी बरखा ……

शायद ही मेरे मन से “ वो ” विस्म्रित हो…
हाँ, मैं अपनी “ बरखा ” की बात कर रहा हू

दिल्ली में बारिश ने बरसों पुराना आंकड़ा बदला था
उसी दिन की ही तो बात है, जब वो मिली थी
जी हाँ… मेरी "बरखा"

बारिश से बचने के लिए
मैने अपनी मोटरसाईकिल रोकी
और उस विशाल पेड़ की ओट मे चला गया

अनायास ही मेरी नजर उस पर पड़ी
एक पल के लिये तो मैं स्तब्ध रह गया
किन्तु जब मेरी नजर उसके चेहरे पर पड़ी
तो मैं जैसे ठगा सा महसूस कर रहा था
मेरी नजर उसके चेहरे से हटाए नहीं हट रही थी

बारिश थमने का नाम ही नही ले रही थी
जैसे ही मैं कुछ आगे बढ़ने की कोशिश की
उसके गीले बदन को ढकना चाहा
वो पीछे हो गई, जैसे वो इनकार कर रही हो
जाने क्यों फ़िर मैं भी रुक गया,
बारिश के थमने के इन्तजार में
अनायाश उस से दूर होने की आशंका

बारिश रुकी…
वहाँ से निकलने से पहले
एक बार फिर मैने उसकी तरफ देखा
उसकी आखों में जैसे कुछ अहसास थे
मै उसकी तरफ धीरे से बढा
उसके सिर पर हाथ फेर के मैं चल दिया

जैसे ही मैं वहां से चला
उसको अपने पीछे आते देखा
मेरे बुलाने पर वो मेरे साथ हो चली
ढेर सारी खुशियों के साथ मैं घर आया

घर आते ही माँ ने पूछा
ये कौन है, ये कहाँ मिली
मैने माँ को समझाया
और उसके लिये गर्म दूध मंगाया

उसकी वो भूरी भूरी आँखें
मुझे आज भी याद हैं
जब वो दूध पीते समय मुझे देख रही थी
मैने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा
और बस कुछ पल, बस कुछ पल
वो मेरे साथ वही बैठी रही
फिर ना जाने कहाँ चली गई
और तभी मैने उसका नाम “बरखा” रखा
क्योंकि मुझे वो बरिश में ही मिली थी

किन्तु, वो मेरी कहाँ…
वो तो किसी और की थी
मैं आज भी उसे याद करता हूँ
मेरी “बरखा”…… मेरी म्याऊँ……

Wednesday, April 11, 2007

अकेले चलो तुम्………

न हो साथ कोई अकेले चलो तुम
सफलता तुम्हारे कदम चूम लेगी

बिना पंख वाले उड़े जो गगन में
न संबन्ध उनके गगन से रहे हैं
अगर उड़ सको तो पखेरू बनो तुम
सफलता तुम्हारे कदम चूम लेगी

वही बीज पनपा पनपना जिसे था
घुना क्या किसी के उगाए उगा है
अगर उग सको तो उगो सूर्य से तुम
सफलता तुम्हारे कदम चूम लेगी

रचनाकार … (अज्ञात)

(जब भी कभी मन मे अवसाद / असफलता मह्सूस हो… ये पंक्तियाँ मुझे हमेशा से प्रेरित कारती रही हैं, और मुझे आगे बढ़ने में मदद करती रहती हैं।)